Friday, 22 November 2019, 11:49 PM

कविता

कैसे कैसे उत्पाद

Updated on 1 January, 2014, 18:58
एक जगह बहुत भीड़ लगी थी एक आदमी चिल्ला रहा था कुछ बेचा जा रहा था आवाज कुछ इस तरह आई शरीर में स्फुर्ति न होने से परेशान हो भाई थकान से टूटता है बदन काम करने में नहीं लगता है मन खुद से ही झुंझलाए हो या किसी से लड़कर आए हो तो हमारे पास है ये दवा सभी... आगे पढ़े

बीट

Updated on 1 January, 2014, 18:55
मैंने देखा, सड़क पर कुछ गुंडे छेड़ रहे थे एक बच्ची को, रो रही थी वह, मदद मांग रही थी मुझसे, पर मैं चुप था, बहुत डरा हुआ था, हँस रहे थे गुंडे, बेबस थी वह बच्ची. डाल पर बैठा एक कौवा सब कुछ देख रहा था, चिल्ला रहा था गला फाड़कर, किए जा रहा था काँव-काँव, पर बेबस था वह भी. अंत में... आगे पढ़े

साल नया फिर आया

Updated on 29 December, 2013, 22:21
लो साल नया फिर आया बच्चों इतिहास नायाब इस बार तुम रचो, बुरी आदतें अब तुरंत तुम छोड़ो बुरी संगत से भी अपना मुंह मोड़ो, कर लो बच्चों तुम एक यह प्रण सेवा में सबकी रहना है अर्पण, मात-पिता व गुरु का सदा मान करो उनके आदर्शों पर अभिमान करो, पढ़-लिखकर सदा अव्वल रहना बातें सदा तुम शालीन ही... आगे पढ़े

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

Updated on 27 December, 2013, 13:43
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.. तुम मत मेरी मंजिल आसान करो.. हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते.. मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते.. सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं.. मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते.. मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे.. तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो.. मैं तूफ़ानों मे चलने का... आगे पढ़े

क्या लिखूँ..??

Updated on 27 December, 2013, 13:38
कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ.. या दिल का सारा प्यार लिखूँ.. कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखूँ या सापनो की सौगात लिखूँ.. मै खिलता सुरज आज लिखूँ या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ.. वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ.. वो पल मे बीते साल लिखूँ या सादियो लम्बी रात लिखूँ.. सागर सा... आगे पढ़े

पर्वत-सी पीर

Updated on 6 December, 2013, 13:06
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश... आगे पढ़े

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ

Updated on 5 December, 2013, 13:21
हरिवंश राय 'बच्चन' सोचा करता बैठ अकेले, गत जीवन के सुख-दुख झेले, दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! नहीं खोजने जाता मरहम, होकर अपने प्रति अति निर्मम, उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! आह निकल मुख से जाती है, मानव की... आगे पढ़े

आज मानव का सुनहला प्रात है

Updated on 4 December, 2013, 12:41
आज मानव का सुनहला प्रात है, आज विस्मृत का मृदुल आघात है; आज अलसित और मादकता-भरे, सुखद सपनों से शिथिल यह गात है; मानिनी हँसकर हृदय को खोल दो, आज तो तुम प्यार से कुछ बोल दो । आज सौरभ में भरा उच्छ्‌वास है, आज कम्पित-भ्रमित-सा बातास है; आज शतदल पर मुदित सा झूलता, कर रहा अठखेलियाँ हिमहास है; लाज... आगे पढ़े

बहुत खूबसूरत समॉ चाहती हूं।

Updated on 3 December, 2013, 17:20
(उषा यादव जी देश की प्रमुख गज़ल़कारों में शुमार की जाती हैं. वर्ष 1991 से लगातार देश की विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में उऩकी ग़ज़लें पाठकों को आनंदित करती रहती हैं . उनकी प्रकाशित रचनाएं अमराईयां औऱ सोजे निहाँ काफी पसंद की जाती हैं . विद्यावाचस्पति , सारस्वत सम्मान से... आगे पढ़े

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

Updated on 3 December, 2013, 14:15
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस गोपालप्रसाद व्यास है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं। है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।। अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।। यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर... आगे पढ़े

ताज़महल

Updated on 11 October, 2013, 12:06
(उषा यादव जी देश की प्रमुख गज़ल़कारों में शुमार की जाती हैं. वर्ष 1991 से लगातार देश की विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में उऩकी ग़ज़लें पाठकों को आनंदित करती रहती हैं . उनकी प्रकाशित रचनाएं अमराईयां औऱ सोजे निहाँ काफी पसंद की जाती हैं . विद्यावाचस्पति , सारस्वत सम्मान से... आगे पढ़े

ये प्यार नहीं है, तो क्या है

Updated on 31 August, 2013, 11:32
ये प्यार नहीं है, तो क्या है, अहसास नहीं है, तो क्या है। तन्हाई की रातों में, जब चाँद उतर आता खिड़की पर, सर्द हवाएं दे जाती हैं, दस्तक चुपके चुपके खिड़की पर। याद किसी की आती है, आंखें टिक जाती खिड़की पर, चादर पर सिलवट पड़ जाती है, और तकिया नम हो जाता है। ये प्यार नहीं है तो... आगे पढ़े

राखी

Updated on 20 August, 2013, 10:45
                  राखी कच्चे धागों से बनी पक्की डोर है राखी प्यार और मीठी शरारतों की होड़ है राखी भाई की लम्बी उम्र की दुआ है राखी बहन के प्यार का पवित्र धुँआ है राखी भाई से बहन की रक्षा का वादा है राखी लोहे से भी मजबूत एक धागा है राखी जांत-पांत और भेदभाव से दूर है... आगे पढ़े

" दोस्ती "

Updated on 3 August, 2013, 15:13
दोस्ती ... आगे पढ़े

आदमी की अनुपात - गिरिजा कुमार माथुर

Updated on 28 July, 2013, 19:36
आदमी की अनुपात गिरिजा कुमार माथुर दो व्‍यक्ति कमरे में कमरे से छोटे - कमरा है घर में घर है मुहल्‍ले में मुहल्‍ला नगर में नगर है प्रदेश में प्रदेश कई देश में देश कई पृथ्‍वी पर अनगिन नक्षत्रों में पृथ्‍वी एक छोटी करोड़ों में एक ही सबको समेटे हैं परिधि नभ गंगा की लाखों ब्रह्मांडों में अपना एक ब्रह्मांड हर ब्रह्मांड में कितनी ही पृथ्वियाँ कितनी ही भूमियाँ कितनी... आगे पढ़े

बाल कविता : इतनी ढे़र किताबें

Updated on 1 July, 2013, 16:18
किसको अपने जख्म दिखाऊं किसको अपनी व्यथा सुनाऊं इतनी ढेर किताबें लेकर‌ अब मैं शाला कैसे जाऊं। बीस किताबें ठूंस ठूंस कर‌ मैंने बस्ते में भर दीं हैं बाजू वाली बनी जेब में पेन पेंसिलें भी धर दीं हैं किंतु कापियां सारी बाकी उनको मैं अब कहां समाऊं। आज धरम कांटे पर जाकर‌ मैंने बस्ते को तुलवाया वजन बीस का निकला मेरा बस्ता... आगे पढ़े

कविता : लाड़ली बेटी

Updated on 1 July, 2013, 16:17
लाड़ली बेटी जब से स्कूल जाने है लगी। हर खर्चे के कई ब्योरे मां को समझाने लगी।। फूल-सी कोमल और ओस की नाजुक लड़ी। रिश्तों की पगडंडियों पर रोज मुस्काने लगी।। एक की शिक्षा ने कई कर दिए रोशन चिराग। दो-दो कुलों की मर्यादा बखूबी निबाहने लगी।। बोझ समझी जाती थी जो कल तलक सबके लिए। घर... आगे पढ़े

शहरे दिल का हरिक अब मकां बन्द है

Updated on 14 June, 2013, 18:04
ग़ज़ल -          उषा यादव ‘ उषा ‘   शहरे दिल का हरिक अब मकां बन्द है, ‘ सुख परिंदा ’ भी आखि़र कहां बन्द है ।   गूंगे आतुर हुये बोलने के लिये, पर ज़बां वालों की तो ज़बां बन्द है ।   एक ऑंधी उठे हुक़्मरॉ के खि़लाफ़, दिल में कब से घुटन ये धुऑं बन्द है... आगे पढ़े

जिंदगी

Updated on 9 June, 2013, 14:57
(उषा यादव जी देश की प्रमुख गज़ल़कारों में शुमार की जाती हैं. वर्ष 1991 से लगातार देश की विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में उऩकी ग़ज़लें पाठकों को आनंदित करती रहती हैं . उनकी प्रकाशित रचनाएं अमराईयां औऱ सोजे निहाँ काफी पसंद की जाती हैं . विद्यावाचस्पति , सारस्वत सम्मान से... आगे पढ़े

जनम से पहले मार न देना...

Updated on 6 June, 2013, 19:52
चाहे मुझको प्यार न देना , चाहे तनिक दुलार न देना कर पाओ तो इतना करना , जनम से पहले मार न देना !! मैं बेटी हूँ , मुझको भी है जीने का अधिकार, मैया जनम से पहले मत मार ! बाबुल जनम से पहले मत मार.. !!   मेरा दोष बताओ मुझको क्यों बेबात सताओ मुझको, मैं... आगे पढ़े

पानी…

Updated on 2 June, 2013, 17:51
पानी जब नहीं देखता, जात-धर्म-प्रखंड, तब मानव क्यों रचता, इन सब पर पाखंड, पानी नित शीतल ही करता, राजा हो या रंक, प्यास बुझाता सब जन की, रहता सदा अखंड, रुप नहीं कोई पानी का, और ना ही कोई रंग, ढल जाता है उस आकार में, रहता जिसके संग, जाति- धर्म को देखता, केवल  मानुस जात, पानी... आगे पढ़े

इंतज़ार

Updated on 28 May, 2013, 15:34

काफ़िर ( मुक्तक )

Updated on 28 May, 2013, 14:56
 ( कवि “ सिफर “ जबलपुर ) मैं काफ़िर हूं क्योंकि मेरा खुदा तुम हो, तुम्हें देखने की तमन्ना नहीं किसी की ,  कौन मुझे काफिर कह पत्थर मारता है, वही जिनके दिलों में खुदा नहीं शैतान है,  खून बहाता है रोज रोज वो काफिर कह कह, खुद को खुदा का बंदा समझ रहा है ,... आगे पढ़े

दोस्ती

Updated on 13 May, 2013, 13:21
अर्थ मतलब पैसा नहीं अर्थ मतलब सहनशक्ति कि इस भूमि पर संघर्ष भी नहीं अर्थ मतलब सबके रहते हुए सब कुछ रहते हुए भी दिल के बहुत करीब कोई दोस्त नहीं उस जीवन का कोई अर्थ नहीं !   -       रंजना झाला, मुंबई ... आगे पढ़े

‘मां’

Updated on 12 May, 2013, 13:43
डॉ. कुंअर बेचैन कभी उफनती हुई नदी हो,  कभी नदी का उतार हो मां रहो किसी भी दिशा-दिशा में,  तुम अपने बच्चों का प्यार हो मां   नरम-सी बांहों में खुद झुलाया,  सुना के लोरी हमें सुलाया जो नींद भर कर कभी न सोई,  जनम-जनम की जगार हो मां   भले ही दुख को छुपाओ हमसे,  ... आगे पढ़े